क्या सिर्फ़ प्रचार से देश चल सकता है? बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और जनता की सच्चाई
क्या सिर्फ़ प्रचार से देश चल सकता है? बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और जनता की सच्चाई भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सरकार का काम केवल भाषण देना, बड़े-बड़े विज्ञापन चलाना और दिखावा करना नहीं है। असली ताकत जनता की आवाज़, उनके संघर्ष, उनके अधिकार और उनकी उम्मीदों में होती है। लेकिन जब आम नागरिक अपने रोज़मर्रा के संघर्षों से जूझ रहा हो और दूसरी तरफ़ सरकार और नेता चमकदार प्रचार में व्यस्त हों, तो एक बड़ा सवाल उठता है — क्या केवल प्रचार और घोषणाएँ ही विकास का सही पैमाना हो सकती हैं? लोकतंत्र की असली परीक्षा क्या है? किसी भी देश की सरकार का सबसे बड़ा मापदंड क्या होना चाहिए? क्या जनता की ज़िंदगी में सकारात्मक बदलाव आया? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या भ्रष्टाचार पर लगाम लगी है? क्या सरकार जनता की बात सुन रही है? क्या सरकारी संस्थान मजबूत और पारदर्शी हैं? क्या सबके लिए समान अवसर मौजूद हैं? अगर इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो समझिए कि देश का वास्तविक विकास अभी अधूरा है। लोकतंत्र का असली आधार ही है—जनता का जागरूक होना और जवाबदेही की माँग करना। बेरोज़गारी: युवा पीढ़ी का सबसे बड़ा दर्द आज भारत...